सिंधिया राजपरिवार का 'तिलिस्म' "चकनाचूर
गुना ज्योतिरादित्य सिंधिया की गुना-शिवपुरी लोकसभा सीट पर हुई करारी हार के साथ ही सिंधिया राजपरिवार का तिलिस्म भी गुरुवार को "चकनाचूर" हो गया। मध्य प्रदेश में सबसे चौंकाने वाला परिणाम गुना-शिवपुरी सीट पर रहा है। यहां से ज्योतिरादित्य सिंधिया की भाजपा प्रत्याशी केपी यादव ने जीत दर्ज कर ली है। सिंधिया घराने का गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर पहली बार सिंधिया परिवार से जुड़ा कोई प्रत्याशी हारा है। खास बात यह है कि जिन केपी यादव से सिंधिया हारा हैं वह कभी उनके समर्थक हुआ करते थे। फरवरी 2018 में मुंगावली विधानसभा उपचुनाव में टिकट नहीं मिलने पर यादव भाजपा में शामिल हो गए थे। इसके पहले तक वह ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक हुआ करते थे।
खास बात यह है कि 1984 में एक छोटी सी रियासत दतिया के राजपरिवार के सदस्य कृष्ण सिंह जूदेव ने इस तिलिस्म पर पहली चोट की थी। इस बार ज्योतिरादित्य के प्रतिनिधि रहे शख्स ने राजपरिवार के तिलिस्म को चकनाचूर कर दिया है।
सिंधिया को शायद पहले से ही गुना-शिवपुरी सीट से हार का अंदेशा था, इसलिए उन्होंने अपनी जीत तय करने के लिए बसपा प्रत्याशी को चुनाव के पहले साथ मिला लिया था। लेकिन, इसका भी असर नहीं हुआ। क्योंकि, वो बड़े अंतर से पीछे चल रहे हैं। इस सीट पर 12 मई को 70.02 प्रतिशत मतदान हुआ था। प्रदेश की गुना सीट पर तीन पीढ़ियों से सिंधिया घराने का कब्जा रहा। ग्वालियर के बाद गुना ही वह लोकसभा सीट है, जहां से सिंधिया परिवार चुनाव लड़ना पसंद करता है। इस सीट से सांसद ज्योतिरादित्य की दादी विजयराजे सिंधिया और पिता माधवराव सिंधिया ने निर्दलीय चुनाव जीतकर इतिहास रचा था। पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में भी इस सीट से ज्योतिरादित्य ने भाजपा नेता और प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया को शिकस्त दी थी।
ग्वालियर-चंबल संभाग में सिंधिया राजपरिवार और राजनीति के बीच चोली-दामन सा साथ रहा है। भाजपा-कांग्रेस दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों में इस परिवार के सदस्यों का रसूख लंबे समय से कायम है। एक दौर था जब राजमाता विजयाराजे सिंधिया की सहमति से भाजपा और उनके पुत्र माधवराव सिंधिया की सहमति से कांग्रेस में टिकट वितरण होता था। नई पीढ़ी में राजपरिवार की कमान ज्योतिरादित्य के हाथों में थी। इस चुनावी समर में वे खुद ही शिकस्त खा बैठे।
इस हार के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ट्वीट किया और जनादेश को स्वीकार करने की बात कही। उन्होंने लिखा कि, "मेरे लिए राजनीति, जनसेवा करने का एक जरिया है और मैं हमेशा जन सेवा के लिए प्रतिबद्ध रहूंगा। मेरी तरफ से डॉक्टर केपी यादव को जीत की बधाई।"
1984 में वसुंधराजे सिंधिया भिंड लोकसभा सीट से भाजपा के टिकट से मैदान में उतरी थीं। उनके सामने कांग्रेस से दतिया राजपरिवार के कृष्ण सिंह जूदेव सामने थे। बेटी वसुंधरा का राजमाता वियजाराजे सिंधिया ने खूब प्रचार किया, लेकिन इंदिरागांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव की लहर में वसुंधरा राजे टिक नहीं सकीं। उन्हें 106757 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के जूदेव को 194160 वोट मिले।
इस तरह वसुंधराराजे 87403 वोटों से हार गईं। वहीं इस बार वसुंधराराजे सिंधिया के भतीजे ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार डॉ. केपी यादव के हाथों हो गई। खास बात यह है कि एक दौर में डॉ. केपी यादव, ज्योतिरादित्य के सांसद प्रतिनिधि हुआ करते थे। मोदी लहर के बीच वक्त ने ऐसी करवट ली कि सिंधिया उन्हीं डॉ. केपी यादव के हाथों हार गए।
ग्वालियर और गुना सीट पर जब भी सिंधिया राजपरिवार का कोई भी सदस्य चुनाव मैदान में उतरा तो हारा नहीं, चाहे फिर पार्टी कांग्रेस रही हो या भाजपा। जनसंघ में आने से पहले राजमात वियजाराजे सिंधिया यहां कांग्रेस से जीतीं। बाद में माधवराव सिंधिया जनसंघ, निर्दलीय व कांग्रेस से जीतते रहे। इस बार गुना-शिवपुरी सीट पर हुई ज्योतिरादित्य की करारी हार से यह तिलिस्म भी "चकनाचूर" हो गया।
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