कर्तव्यनिष्ठा

कर्तव्यनिष्ठा
सरकारी अफसर की रिटायरमेंट या ट्रांसफर पर क्या माहौल होता है। रिटायमेंट पर बाकयदा फेयरवेल दी जाती है। ट्रांसफर का तो खैर पता ही नहीं चलता । कुछ दिनों बात जब दफ्तर में जाएं तो पता चलता है के साहब का ट्रांसफर दूसरे जिले में हो गया है। परंतु क्या कोई ऐसा सरकारी नुमाइंदा भी होगा जिसे जाने से रोकने के लिये 1000 स्थानीय लोगों की भीड़ इक्कठी हो जाये और शहर से बाहर जाने वाला रास्ता एक घंटे तक रोक दिया जाये। ............................................... आज से 8 बरस पहले डॉ किशोर चरण दास ओड़िसा के एक पिछड़े इलाके टेंटुलखुंन्ति के CHC (कम्युनिटी हेल्थ सेंटर) में कार्यरत हुए थे। हालात ऐसे थे के हॉस्पिटल के नाम पर केवल औपचारिकता थी। 80% डॉक्टर्स की कुर्सी खाली थी क्योंकि किसी डॉक्टर को पदभार दिया ही नहीं गया था । सुविधाएं शून्य थी और हालात बद से बदतर थे। स्थिति इतनी विकट थी के स्थानीय निवासी मूलभूत सुविधाओं के आभाव के चलते दम तोड़ देते थे। इसी बीच डॉ दास ने अपनी जॉइनिंग के बाद निश्चय कर लिया के वहां के हालात को बदल कर ही दम लेंगे। लड़ाई सरकार से थी जो सुविधओं के नाम पर ठेंगा दिखा रही थी और डॉ दास स्वयं एक सरकारी मुलाज़िम थे। डॉ दास ने वहां के बिगड़े हालात को लेकर स्टेट और सेंटर तक के अफसरों और नेताओं से सम्पर्क साधना शुरू किया। चिट्ठियां लिखी । ईमेल डाली । जवाब ना मिला तो स्वयं नेताओं के दफ्तर के आगे डटे रहे। बड़े अफसरों से ग्रामवासियों के हक के लिये सीधा भिड़ते रहे। नेताओं के सामने अपना विरोध ज़ाहिर किया। उनके इस व्यवहार से कई नेतागण नाराज़ भी हुये लेकिन डॉ किशोर ने ना कभी अपनी और ना कभी अपनी नौकरी की परवाह की। आखिरकार उनका विद्रोह रंग लाया। अपने दम पर डॉ दास ने कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में एक एयर कंडिशन्ड डिलीवरी रूम एक ऑपरेशन थियटर और एक ऑक्सीजन कॉन्सन्ट्रेटर का निर्माण करवाया। दवाइयों की आपूर्ति के लिए दिन रात सरकार और प्रशासन से लड़ाई के बाद आपूर्ति को नियमित करवाया। जनता को उनका नायक मिल गया था। स्थानीय कम्युनिटी सेंटर अब बदहाल नहीं था । इतनी सुविधाएं थी के कम से कम एक मरीज़ की जान बचाई जा सकती थी। डॉ दास की मुहीम यहीं नहीं रुकी। उन्होंने अपना नम्बर ग्राम पंचायतों और तालुकाओं में बांट दिया । 24 घण्टे में कोई भी स्थानीय निवासी डॉ दास को फोन कर मिलने के लिये स्वतंत्र था। दिन रात एक कर दी और एक चिकित्सक के रूप में एक दिन में जितना काम कर सकते थे उससे कहीं अधिक करने का प्रयास किया। स्थानीय निवासी बताते हैं के डॉ दास को खुद भी याद नहीं है के उन्होंने कितने लोगों को मौत के मुंह से निकाला है। नर्सिंग स्टाफ के अनुसार ऐसे कई दिन बीते जब डॉ दास 24 में से 18 घण्टे तक अपनी कुर्सी पर डटे रहे। फिर एक दिन डॉ दास ने निर्णय लिया के उन्हें आगे की पढ़ाई के लिये वहां से जाना होगा। उन्होंने यह बात किसी भी स्थानीय व्यक्ति को नहीं बताई । परन्तु कहीं से जानकारी मिलने के बाद उनके जाने की बात जंगल की आग की तरह फैल गयी। जिस दिन उन्होंने जाना था उस दिन लगभग 1000 लोगों के हुजूम ने उन्हें घेर लिया। असंख्य लोगों ने उनसे वहां से ना जाने का आग्रह किया। उस भीड़ में ना जाने ऐसे कितने वयस्क महिलायें वृद्ध और बच्चे थे जिन्हें डॉ दास ने जीवन दान दिया था। हालात यह हो गए के स्थानीय निवासियों के हुजूम के चलते मुख्य सड़क एक घण्टे तक रुकी रही। निवासी बताते हैं के यह वह क्षण थे जब हज़ारो लोगों की आंखें नम थी। युवा अपने नायक को विदा देते उनके साथ सेल्फी ले रहे थे। बुज़ुर्ग आशीर्वाद दे रहे थे। इसी बीच कुछ ऐसा हुआ जो अविश्वसनीय था। डॉ दास स्वयं एक अबोध बच्चे की तरह फूट फूट के रोने लगे। जिस पौधे को उन्होंने एक वृक्ष में अपनी 8 साल की अथक मेहनत और क़ाबलियत से तब्दील किया था अब उसे छोड़ कर जाने का समय था। बताया जाता है के स्थानीय निवासियों ने डॉ बाबू ( जैसा के उन्हें कहा जाता है ) को एक वायदे पर जाने दिया है। वायदा यह है के वह पढ़ाई पूरी कर वापिस वहीं उन लोगों के बीच आएंगे। एक जर्जर और बदहाल कम्युनिटी हेल्थ सेंटर को डॉ दास ने अब एक सुविधापूर्ण मिनी हॉस्पिटल का रूप दे दिया है। जिस इलाके में प्रसव के दौरान महिलाओं का दम तोड़ देना आम बात थी उसी इलाके में अब एक सुचारू डिलीवरी रूम है। तस्वीर में डॉ दास नम आंखों से हाथ जोड़ कर उन अभी लोगों से विदा ले रहे हैं जिनके उत्थान के लिए उन्होंने दिन रात एक किया है। यह जनता किसी नेता के सम्मान मे बुलाई गई भाड़े की जनता नहीं है। यह लोग एक सरकारी मुलाज़िम की कर्तव्यनिष्ठा को नमन करने एकत्रित हुये हैं। इस भीड़ में से ना जाने ऐसे कितने लोग हैं जिन्हें डॉ दास ने नवजीवन प्रदान किया है। आज़म खान जैसे नेता को यह दृश्य दिखाना चाहिए। अधिकारियों से जूते "साफ" करवाने की बात कहने वाले आज़म जैसे नेता डॉ दास जैसे कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति से सीख सकते हैं के इस सड़ी गली सरकारी प्रणाली को किस जज़्बे से 'साफ' करके सुचारू बनाया जा सकता है।

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